अधिगम के नियम – थार्नडाइक के सीखने के नियम

अधिगम के नियम- अधिगम का हिंदी अर्थ सीखना होता है। थार्नडाइक महोदय ने अधिगम सम्बन्धी नियम दिए हैं। इन अधिगम या सीखने के नियम को समझने से पहले ये भी जानना होगा कि मुख्य नियम में कौन से आते हैं. और गौण नियम में कौन से आते हैं। आज के इस आर्टिकल में अधिगम (Learning) से रिलेटेड आपके सारे doubts दूर हो जाएंगे।

ये अधिगम के मुख्य नियम कितने हैं? अधिगम के गौण नियम कितने हैं? देखिये थार्नडाइक के अधिगम के मुख्य और गौण नियम पढ़ने से पहले मुख्य और गौण का अर्थ जान लिया जाए। मुख्य में वो नियम आते हैं जो एकदम ज़रूरी हैं और वो ही खोजे गये हैं सबसे पहले। वही आवश्यक हैं। वही आधार हैं। और गौण में वो नियम आते हैं जिनके बिना भी काम चल सकता है या जो मुख्य के बाद आते हैं।


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अधिगम के नियम

अधिगम के नियम || थार्नडाइक के सीखने सम्बन्धी नियम

थार्नडाइक महोदय ने अधिगम या सीखने सम्बन्धी मुख्य और गौण नियम दिए। जो इस प्रकार हैं-

थार्नडाइक के अधिगम के मुख्य नियम

सीखने के इन नियमों की संख्या 3 है-

  • ततपरता का नियम
  • अभ्यास का नियम
  • प्रभाव का नियम / परिणाम का नियम / सन्तोष का नियम

1- थार्नडाइक का ततपरता का नियम

इस नियम को English में Principle of readiness कहते हैं। इस नियम के अनुसार यदि बच्चा किसी काम को सीखने के प्रति तत्पर है तो वो उस काम को जल्दी सीख जाएगा। इसके उलट अगर वो तत्पर नही है तो उसे सीखने में कठिनाई आएगी।

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अर्थात यदि बच्चे की किसी कार्य मे रुचि है तो वो आराम से सीख जाएगा और सुखद अनुभव करेगा। पर यदि रुचि नही है तो नही सीख पायेगा।

जैसे यदि बच्चे की गणित में रुचि है तो उसके सवालों को जल्दी सीख जाएगा अन्यथा नही। ऐसे ही विज्ञान और कम्प्यूटर जैसे विषयों के लिए भी है।

2- थार्नडाइक का अभ्यास का नियम

कहते हैं कि करत-करत अभ्यास ते जड़ मति होत सुजान। यह बात पूर्णतया सही है। जितना अभ्यास होगा बच्चा उतना सीखेगा।

इंग्लिश में भी कहते हैं “Practice Makes a man Perfect”. येे बात भी एकदम सही है।

यदि हम किसी काम को बार-बार करते हैं तो वह हमे आ जाता है। यह कार्य बार-बार करना ही तो अभ्यास है। जितना अधिक अभ्यास होगा, सीखना उतना स्थाई होगा। और अभ्यास काम होगा तो सीखना स्थाई नही हो पायेगा।

इसी बात को थार्नडाइक महोदय ने अपने अभ्यास के सिद्धांत में बताया है।


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3- प्रभाव का नियम / परिणाम का नियम / सन्तोष का नियम

श्रीमान थार्नडाइक जी ने बताया कि जिस काम को करने में बच्चे को आनंद आएगा वह काम जल्दी सीखेगा। अतः जिस कार्य के परिणाम बच्चे को आनंद देते हैं वह कार्य वह जल्दी सीखता है। उसके प्रभाव से उसे आनंद मिलता है। उसे सन्तोष मिलता है। यही प्रभाव का नियम / परिणाम का नियम / सन्तोष का नियम है।

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थार्नडाइक के सीखने/अधिगम के गौण नियम

सीखने के इन नियमों की संख्या 5 है। –

  1. मनोवृत्ति का नियम
  2. बहु अनुक्रिया का नियम
  3. आंशिक क्रिया का नियम
  4. अनुरूपता का नियम
  5. सम्बंधित परिवर्तन का नियम

1- मनोवृत्ति का नियम

बच्चे की अगर किसी कार्य को करने की मन से इच्छा होगी। तो ही वह उस कार्य को सीख पायेगा अन्यथा नही सीख पायेगा। मन से सीखने की यह प्रवृत्ति ही मनोवृत्ति है। और यही मनोवृत्ति का नियम है।

2- बहु अनुक्रिया का नियम

किसी एक कार्य को करने की कई विधियां या कई रास्ते होते हैं। वैसे ही बच्चा भी किसी कार्य को सीखने में बहुत से अनुक्रियाएँ करता है। फिर उनमें से उसके लिए उचित और सही अनुक्रिया ढूंढ लेता है। जिससे परिणाम तक पहुंचा जा सके। क्योंकि कुछ अनुक्रियाएँ उपयोगी होती हैं और कुछ अनुपयोगी होती हैं। तो उपयोगी अनुक्रियाएँ वह चुन लेता है।


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3- आंशिक क्रिया का नियम

किसी काम को पूरा एक साथ सीखना थोड़ा कष्टप्रद होता है। अर्थात पूरे कार्य को एक साथ सीखने से अच्छा उस कार्य को अंशो में विभाजित करके सीखा जाए। कार्य को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर उसे सीखना, उस कार्य को आसान बना देता है। यही थार्नडाइक के आंशिक क्रिया का नियम है।

4- अनुरूपता का नियम

थार्नडाइक अनुरूपता के नियम के जरिये बताते हैं कि इसमें व्यक्ति अपने पूर्वानुभवों और प्रयत्नों से अपनी समस्या की तुलना करता और फिर उसके अनुरूप समाधान निकालता है। यही अनुरुपता का नियम है।

5- सम्बंधित परिवर्तन का नियम

इस नियम को साहचर्य परिवर्तन का नियम भी कहते हैं। इसके अनुसार व्यक्ति अपनी क्षमताओं को नई परिस्थितियों में भी प्रयोग कर सकता है। इसमे क्रिया का स्वरूप वही रहता है पर परिस्थिति में परिवर्तन में हो जाता है।

शिक्षक को कक्षा में अच्छी आदतों एवं सकारात्मक अभिरुचि को उत्पन्न करना चाहिए ताकि छात्र उनका उपयोग अन्य परिस्थितियों में भी कर सकें।

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